खण्डवा में भी सौ बरस पुरानी है गरबों की परम्परा।
गुजरात से ही आई थी यह सांस्कृतिक सुगंध।
खंडवा। नवरात्रि उत्सव की बात हो तो सबसे पहले ज़ेहन में गुजरात का गरबा ही आता है जिसकी धूम पूरे में है। हालाँकि माँ दुर्गा की उपासना तो पूरे देश में होती है फिर गरबों की सांस्कृतिक सुगंध गुजरात से ही क्यों फैलती है ? तमाम गरबे गुजराती भजनों पर ही क्यों होते है ? जहां बाकी राज्यों में त्योहार मुख्य रूप से पूजा-पंडालों, उपवास या झांकियों तक सीमित रहता है, वहीं गुजरात में यह भक्ति, संगीत, नृत्य और सामाजिक उत्सव का एक अनूठा संगम बन जाता है। गुजरात की नवरात्रि दुनिया का सबसे लंबा चलने वाला सामूहिक नृत्य महोत्सव माना जाता है। इसे UNESCO की ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ की सूची में शामिल किया गया था, जो इसकी वैश्विक महत्ता को दर्शाता है।
खण्डवा में गरबों की शुरुआत भी गुजराती समाज से
समाजसेवी सुनील जैन ने बताया कि दरअसल इस समय देश में जहाँ भी गरबों की धूम मची है उसके पीछे गुजरात की ही समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा है , गुजरात से निकलकर देश -दुनिया के जिन -जिन भी हिस्सों में गुजराती पहुंचे उन्होंने अपनी संस्कृति का रौंपा वहां भी लगाया। माता रानी की आराधना के लिए पूरे शहर के मोहल्ले एवं गलियों में माता जी की स्थापना के साथ गरबों का आयोजन हुआ, इस वर्ष सामूहिक बड़े गरबे कार्यक्रम शहर में न होने के कारण मोहल्ले गलीयों मैं गरबों की की रौनक बनी रही, खण्डवा में भी गरबों की सौ बरस से ज़्यादा पुरानी परम्परा गुजराती समाज ही लेकर आया और आज भी उसे जीवंत रखे हुए है। महत्वपूर्ण बात यह है कि गुजरात से निकलकर विभिन्न धर्म -संप्रदाय के लोग खण्डवा आये लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान के लिए वे एकजुट हो गए। खण्डवा में वृहत गुजराती समाज 9 घटकों से मिलकर बना है जिसमे श्री कच्छ कड़वा पाटीदार समाज, श्री दसा श्रीमाली समाज , श्री वीसा लाड़ समाज ,श्री चरोत्तर पटेल समाज ,सोरठिया समाज , श्री कच्छी दसा ओसवाल श्वेताम्बर जैन समाज ,श्री दसा श्रीमाली जैन श्वेताम्बर समाज ,श्री सोनी समाज एवं श्री गुजराती मोड़ समाज शामिल है। इन सभी समाजो के आराध्य और पूजन पद्धति भले अलग -अलग हो लेकिन इनकी भाषा और सांस्कृतिक पहचान एक ही है। खण्डवा में गरबे की इस परम्परा की शुरुआत ही गुजराती समाज ने की और आज भी यह अनवरत जारी है। पहले यह गरबे पंधाना रोड़ स्थित गुजराती धर्मशाला में ही होते थे लेकिन इस भवन के जीर्ण -शीर्ण होने से विगत दो वर्षो से यह शुभ -मोती कॉम्प्लेक्स ( मेन हॉस्पिटल के सामने ) हो रहे है।
गुजरात से ही कैसे शुरू हुई गरबों की परम्परा
समाजसेवी सुनील जैन ने बताया कि गरबा की शुरुआत विशेष रूप से गुजरात से ही होने के पीछे गहरे धार्मिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कारण हैं। गुजरात की भूमि पर कुछ ऐसी परिस्थितियां और मान्यताएं एक साथ आईं, जिन्होंने इस गरबे को रचा। दरअसल गुजरात सदियों से देवी माता (शक्ति) की उपासना का एक बहुत बड़ा केंद्र रहा है। भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक, अंबाजी शक्तिपीठ, गुजरात में ही स्थित है। इसके अलावा पावागढ़ में महाकाली और बहुचराजी माता के मंदिर गुजरात की संस्कृति के मूल में हैं। देवी अंबा (जगतजननी) के प्रति अगाध श्रद्धा के कारण, वहां ग्रामीण महिलाओं ने माता की आराधना के लिए एक विशेष नृत्य शैली विकसित की, जिसे ‘गरबा’ (गर्भदीप के इर्द-गिर्द नृत्य) कहा गया।
गरबा और रासलीला का सम्बन्ध
सुनील जैन ने बताया कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गरबा और डांडिया की जड़ें भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी हैं। जब श्रीकृष्ण मथुरा छोड़कर गुजरात के द्वारका में बसे, तो वे अपने साथ ‘रास’ की परंपरा लेकर आए। माना जाता है कि कृष्ण की पुत्रवधू उषा (प्रद्युम्न की पत्नी) ने लास्य नृत्य शैली सीखी थी, जिसे उन्होंने द्वारका और सौराष्ट्र की गोपियों व महिलाओं को सिखाया। यही लास्य नृत्य आगे चलकर गुजरात का पारंपरिक ‘गरबा’ बना। गरबा जहां मां शक्ति की पूजा से जुड़ा है, वहीं डांडिया रास भगवान कृष्ण की गोपी-संस्कृति (रासलीला) से आता है। यह अद्भुत जुगलबंदी केवल इसी राज्य में देखने को मिलती है।
पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा में जहां लोग पंडालों में दर्शन करने (देखने) जाते हैं, वहीं गुजरात की नवरात्रि में हर व्यक्ति (बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक) दर्शक नहीं, बल्कि उत्सव का हिस्सा बनकर शामिल होता है। 2023 में गुजरात के गरबा को UNESCO की ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ की सूची में शामिल किया गया था, जो इसकी वैश्विक महत्ता को दर्शाता है।
