क्षमावाणी महोत्सव में गूंजा आत्मशुद्धि और मैत्री का संदेश
पोरवाड़ दिगंबर जैन समाज ने निकाली श्रीजी की पालकी यात्रा,
तपस्वियों व वरिष्ठजनों का सम्मान;
एसपी अगम जैन ने कहा—हर वर्ष क्षमा मांगने के साथ आत्ममंथन करना भी जरूरी
खंडवा/
पर्युषण पर्व की आराधना के समापन अवसर पर पोरवाड़ दिगंबर जैन समाज द्वारा रविवार 27 सितंबर को क्षमावाणी महोत्सव श्रद्धा, भक्ति और आत्मशुद्धि के भाव के साथ मनाया गया। क्षमावाणी जैन धर्म की उस महान परंपरा का पर्व है, जिसमें मन, वचन और कर्म से हुई भूलों के लिए क्षमा मांगते हुए सभी के प्रति मैत्री, सद्भाव और आत्मीयता का भाव व्यक्त किया जाता है और एक दूसरे से अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगी जाती है।
समाज के मीडिया प्रभारी सुनील जैन एवं प्रेमांशु चौधरी ने बताया कि सुबह 7.30 बजे श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर सराफा से श्रीजी की पालकी यात्रा निकाली गई। यात्रा बुधवारा, केवलराम पेट्रोल पंप, बॉम्बे बाजार एवं सराफा होते हुए चौधरी जी के कुएं पहुंची। यहां पूजन के बाद पोरवाड़ दिगंबर जैन धर्मशाला में श्रीजी का अभिषेक एवं शांतिधारा संपन्न हुई। इस अवसर पर वरिष्ठजनों और तपस्वियों का सम्मान किया गया। कार्यक्रम में जिला पुलिस अधीक्षक अगम जैन ने क्षमावाणी पर्व के महत्व पर उद्बोधन दिया। इसके बाद समाज के दानदाताओं के सहयोग से पोरवाड़ समाज एवं आमंत्रित अतिथियों का वात्सल्य भोज हुआ।
पालकी यात्रा के दौरान कांतिलाल जैन, संजय पंचोलिया, सौरभ जैन एवं अंकित जैन ने सुंदर भजनों की प्रस्तुतियां दीं। प्रेमांशु चौधरी ने बताया कि क्षमावाणी पर्व पर श्रीजी की शांतिधारा करने का सौभाग्य विकास कुमार, विपिन कुमार एवं चिंतामण जैन को प्राप्त हुआ। वहीं श्रीजी का स्वर्ण कलश से अभिषेक करने का सौभाग्य रितिक जैन भोपाल परिवार तथा श्रीजी के माल का सौभाग्य प्रो. विपिन जैन परिवार को प्राप्त हुआ।कार्यक्रम में सुंदर मंगलाचरण नृत्य नमिता जैन,शालू जैन ,श्वेता जैन द्वारा प्रस्तुत किया गया।
“हर वर्ष क्षमा मांगने के साथ आत्ममंथन भी जरूरी” : अगम जैन
जिला पुलिस अधीक्षक अगम जैन ने समाज के समक्ष अपने उद्बोधन में कहा कि हम लोग प्रतिवर्ष क्षमावाणी मनाते हैं और प्रतिवर्ष उन्हीं लोगों से क्षमा मांगते हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि ऐसी जरूरत बार-बार क्यों पड़ती है? हर बार हम वैसे ही विवाद या लड़ाई क्यों करते हैं?
उन्होंने कहा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हम क्षमा मांगकर यह मान लेते हैं कि पुराने पाप धुल गए और अबकी बार तुम्हें और अच्छे से सबक सिखाएंगे। यदि क्षमावाणी पर्व मनाने का अर्थ यही रह गया तो इसके उद्देश्य पर विचार करना होगा। उन्होंने कहा कि यदि हम दस दिन के इस पर्व को मनाएं तो प्रत्येक वर्ष हमें आत्मशुद्धि और आत्मसंयम के अगले सोपान पर पहुंचना चाहिए। यदि पिछले वर्ष जैसी स्थिति इस वर्ष भी बनी रहे तो फिर क्षमावाणी और दस लक्षण पर्व मनाने का वास्तविक उद्देश्य क्या रह जाएगा?
एसपी अगम जैन ने कहा कि क्षमावाणी का पर्व ऐसा अवसर है, जब पूरे वर्ष में सभी लोगों से इतने अच्छे ढंग से मिलना और चर्चा करना संभव हो पाता है। अन्यथा दस दिनों के दौरान भी सभी लोगों के अपने-अपने समय बंधे होते हैं। दीपावली और रक्षाबंधन जैसे पर्व भी अधिकांशतः पारिवारिक रूप से मनाए जाते हैं, लेकिन पूरे वर्ष में क्षमावाणी ऐसा अवसर है, जिसमें सभी लोगों से आत्मीयता के साथ मिलना और संवाद करना हो पाता है।
उन्होंने कहा कि दस लक्षण पर्व बहुत ही शुचिता, तप, संयम और साधना के पर्व हैं। भले ही इस दौरान कोई छोटा-मोटा कटाक्ष या छोटी-मोटी बात हो जाए, लेकिन कुल मिलाकर सभी मिलकर जो साधना करते हैं, वह निश्चित ही मन को पवित्रता से भर देती है। यही साधना आने वाले 355 दिनों के लिए भूमि तैयार करती है कि हम उस पवित्रता के साथ अपने जीवन की शुरुआत करें। धीरे-धीरे समय बीतता है और अगला दशलक्षण पर्व आ जाता है। फिर हम अपने आपको संयमित करते हैं, एकजुट करते हैं और आने वाले समय के लिए तैयार होते हैं।
बच्चों को महापुरुषों और धर्म के मूल सिद्धांतों से जोड़ना जरूरी
अगम जैन ने अपने बचपन की स्मृतियां साझा करते हुए कहा कि बचपन में वे लोग दशलक्षण पर्व का इंतजार इसलिए भी करते थे, क्योंकि इस दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम बहुत अच्छे होते थे। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में इनाम मिलते थे। किसी दिन भजन प्रतियोगिता होती थी तो पूरे वर्ष यह तैयारी रहती थी कि कौन-सा भजन गाया जाएगा। अंताक्षरी प्रतियोगिता के लिए भी पूरे साल तैयारी की जाती थी कि यदि ‘म’ से शब्द खत्म होगा तो क्या बोलेंगे, ‘क’ से खत्म होगा तो क्या बोलेंगे और ‘ह’ से खत्म होने पर भक्तामर का कौन-सा छंद बोला जाए, जिसका जवाब अगले व्यक्ति को न आए।
उन्होंने कहा कि आप सभी ने भी ऐसी तैयारियां की होंगी। वाद-विवाद प्रतियोगिताएं होती थीं। ‘धर्म बड़ा है या धन’, ‘पुण्य बड़ा है या पाप’, ‘शुभ भाव बड़े हैं या अशुभ भाव अथवा अशुद्ध भाव’ जैसे विषयों पर चर्चा होती थी। ऐसे कई विषय थे, जिन पर बचपन में विचार-विमर्श किया जाता था।
उन्होंने कहा कि प्रश्नमंच भी आयोजित होते थे। प्रश्नमंच में ‘वे कौन से मुनिराज थे’ एक ऐसा सेक्शन होता था, जिसमें अलग-अलग मुनिराजों के बारे में पूछा जाता था। कौन से मुनिराज थे, जिन्हें उपसर्ग हुआ, कौन थे जिनका उपशम हुआ, कौन से मुनिराजों ने कितने दिनों तक उपवास किया, इस प्रकार के अलग-अलग प्रश्न होते थे।
अगम जैन ने कहा कि किसी दिन जिनवाणी सजाओ प्रतियोगिता भी होती थी कि कौन अपने घर से जिनवाणी को अच्छे से सजाकर लेकर आएगा। ये सभी कार्यक्रम मुझे आज भी याद हैं। उन्होंने समाजजनों से आग्रह किया कि यदि ऐसे कार्यक्रम वर्तमान में नहीं हो रहे हैं तो इन्हें पुनः आयोजित किया जाना चाहिए। हमारे बच्चे ही हमारा भविष्य हैं। वे हमारे प्रथमानुयोग और महापुरुषों के बारे में कितना जानते हैं, इसकी तैयारी कराना बहुत आवश्यक है। ऐसे आयोजन बच्चों के भविष्य की भूमि तैयार करते हैं और उन्हें अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ते हैं।
तपस्वियों और वरिष्ठजनों एवं अतिथि एसपी का सम्मान
सुनील जैन प्रेमांशु चौधरी ने बताया कि क्षमा वाणी महोत्सव कार्यक्रम के अंतर्गत दस उपवास करने वाले श्रावक श्रेष्ठी ऋषभ गंगवाल एवं श्रीमती रागिनी अनिल जैन बीड़ वालों के साथ ही
5, 3 उपवास करने वालों का भी पोरवाड़ समाज द्वारा अभिवादन किया गया। बच्चों द्वारा एक और दो दिन के उपवास रखे गए उन्हें भी सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में समाज के वरिष्ठजनों डॉ. सुभाष जैनी स्व. सुमेरचंद जैनी, सुशील कुमार स्व. कस्तूरचंद जैन, श्रीमती सुभद्रा बाई स्व. सुखचंद जैन, श्रीमती पुष्पा बाई प्रेमचंद धनोते, श्रीमती प्रभावती स्व. शरद कुमार जैन एवं माणकचंद स्व. नत्थू सा जैन एवं अतिथि के रूप में शामिल पुलिस अधीक्षक अगम जैन का सम्मान समाज के ट्रस्टियों वीरेंद्र भट्यांण, नितिन जैन, दिनेश जैन, संतोष बॉस, राजेश जैन, अतुल जैन, पंकज जैन, तरुण जैन, संकल्प जैन, सुधांशु चौधरी एवं प्रेमांशु जैन अधिवक्ता ने शाल, श्रीफल एवं मोमेंटो प्रदान कर किया।
कार्यक्रम का सफल संचालन पंकज जैन ने किया। आभार ट्रस्ट मंडल के सदस्य सुधांशु चौधरी ने माना।
