*संपादक/तनिश गुप्ता*
मायुस होकर 24 साल पुराना बीएसएनएल का साथ छूटा, नेटवर्क की परेशानी ने जियो की ओर मोड़ा।
मोबाइल युग की शुरुआत में लिया था बीएसएनएल का पहला सिम, तकनीकी दिक्कतों के चलते बदलना पड़ा नेटवर्क।
खंडवा। जिस बीएसएनएल की सिम 24 साल तक सीने से लगाकर रखी, आखिर उसी सरकारी कंपनी का नेटवर्क जवाब दे गया। अक्टूबर 2002 में मोबाइल सेवा शुरू होने के दौर में बीएसएनएल का सिम लेने वाले उपभोक्ता ने वर्षों तक नेटवर्क की छोटी-बड़ी परेशानियां सहन कीं, लेकिन जब समस्या लगातार बढ़ती गई तो आखिरकार उसी पुराने नंबर को जियो में पोर्ट कराना पड़ा। समाजसेवी पूर्व टेलीफोन सलाहकार समिति के सदस्य सुनील जैन ने बताया कि यह सिर्फ एक उपभोक्ता के नेटवर्क बदलने की कहानी नहीं, बल्कि उस सरकारी दूरसंचार व्यवस्था पर बड़ा सवाल है, जिसने कभी देश को मोबाइल कनेक्टिविटी की राह दिखाई थी और आज निजी कंपनियों की तेज रफ्तार के सामने खुद नेटवर्क के लिए जूझती नजर आ रही है।
सुनील जैन ने बताया कि मोबाइल युग की शुरुआत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के कार्यकाल में अक्टूबर 2002 में बीएसएनएल मोबाइल सेवा शुरू हुई थी। खंडवा में पहले चरण में करीब 1000 सिम पहुंची थीं। इसी दौरान प्रथम उपभोक्ता के रूप में मैंने बीएसएनएल की सिम लेकर मोबाइल सेवा की शुरुआत की थी। तब से करीब 24 वर्षों तक वे इसी नंबर और बीएसएनएल सेवा से जुड़े रहे।
इस दौरान कई बार तकनीकी कारणों से परेशानियां आईं, लेकिन बीएसएनएल से उनका जुड़ाव बना रहा। उनका कहना है कि सरकारी दूरसंचार कंपनी होने के कारण लंबे समय तक छोटी-मोटी परेशानियों को नजरअंदाज करते हुए सेवा का इस्तेमाल जारी रखा।
एक महीने तक नेटवर्क की परेशानी
समाजसेवी सुनील जैन ने बताया कि पिछले करीब एक महीने से बीएसएनएल के नेटवर्क में परेशानी बढ़ गई। कॉलिंग और अन्य मोबाइल सेवाओं में आ रही दिक्कतों के कारण रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगे। लंबे समय तक समस्या दूर नहीं होने पर उन्होंने दूसरे उपभोक्ताओं से भी जानकारी ली। इस दौरान उन्हें पता चला कि वे अकेले नहीं हैं। बीएसएनएल के कई उपभोक्ता नेटवर्क संबंधी समस्याओं से परेशान हैं और लगातार अपने नंबर दूसरी कंपनियों में पोर्ट करा रहे हैं।
आखिरकार तीन दिन पहले मेंने उसी 24 साल पुराने नंबर को जियो नेटवर्क पर पोर्ट करा लिया। सिम सक्रिय होने के बाद उन्हें नेटवर्क में काफी अंतर महसूस हुआ। उनका कहना है कि बेहतर नेटवर्क मिलने से रोजमर्रा के कामों में भी सुविधा महसूस हो रही है।
दुख इस बात का कि 24 साल का साथ मजबूरी में टूटा
सुनील जैन का कहना है कि बीएसएनएल से जुड़ाव केवल एक मोबाइल सिम का नहीं था, बल्कि 24 वर्षों का भरोसा था। इतने लंबे समय तक कंपनी की सेवा इस्तेमाल करने के बाद भी तकनीकी और नेटवर्क संबंधी समस्याओं के कारण सरकारी दूरसंचार कंपनी से दूर होना पड़ा, इसका दुख है।
निजी कंपनियां आगे, बीएसएनएल से सवाल
दूरसंचार सेवाओं में भारत सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बीएसएनएल ने देश के दूरदराज क्षेत्रों तक दूरसंचार सेवाएं पहुंचाने में अहम योगदान दिया है। लेकिन मोबाइल और इंटरनेट के तेजी से बदलते दौर में निजी कंपनियां नेटवर्क विस्तार और तकनीकी सुविधाओं के मामले में तेजी से आगे बढ़ी हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि बीएसएनएल की सेवाओं और नेटवर्क को आधुनिक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप मजबूत करने की गति आखिर इतनी धीमी क्यों है? जब वर्षों से जुड़े उपभोक्ता भी नेटवर्क की समस्या के कारण दूसरी कंपनियों का रुख करने लगें तो यह केवल ग्राहक के कंपनी बदलने का मामला नहीं, बल्कि सेवा व्यवस्था में सुधार की जरूरत का संकेत भी है।
सुनील जैन ने बताया कि आज मोबाइल और इंटरनेट केवल सुविधा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जरूरत बन चुके हैं। ऐसे में बीएसएनएल को मजबूत नेटवर्क, आधुनिक तकनीक और बेहतर उपभोक्ता सेवाओं के साथ निजी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा में आगे लाने की जरूरत है। 24 साल पुराने उपभोक्ता का बीएसएनएल छोड़ना शायद एक व्यक्तिगत फैसला हो, लेकिन इसके पीछे उठ रहा सवाल पूरे दूरसंचार तंत्र के लिए गंभीर है।
