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कविता

कविता

गोली मार दो!
पूछता है प्रश्न साहब से, हिसाब माँगता है जो,
लोकतंत्र का अर्थ भी जनाब जानता है जो,
ऐसे खतरनाक आदमी को प्यार-व्यार छोड़ दो,
देशहित में फ़ौरन उसको—गोली मार दो!
कह रहा है गाँव में अब भी अँधेरा क्यों बसा,
क्यों किसी की थाली खाली, क्यों किसी का घर धँसा,
झूठ की रंगी हुई दीवार पर जो वार हो,
ऐसे हर सच बोलने वाले को—गोली मार दो!
भ्रष्टाचारों की नदियों पर जो बाँध बाँधता फिरे,
रिश्वतों के साम्राज्य पर जो रोज़ प्रश्न करता फिरे,
फाइलों के देवताओं से करे जो तकरार वो,
व्यवस्था-विरोधी तत्व है, उसको—गोली मार दो!
हक़ की बातें, संविधान और न्याय की भाषा लिए,
वंचितों के दर्द को सीने में लेकर जो जिए,
जो जगाता भीड़ को नागरिक बनाने के लिए,
ऐसे ख़तरनाक ख़्वाबों को अभी—गोली मार दो!
गाँव के बच्चों को शिक्षा, खेत को पानी मिले,
रोज़गारों की हवा में कुछ नई रवानी मिले,
माँगता है बस यही अधिकार, कितना धूर्त है,
राष्ट्र-विकास रोकता है, इसको—गोली मार दो!
रेत, जंगल, खान, नदियाँ बिक रही हैं चुपचाप,
बीच में आकर जो पूछे, किसके हिस्से है यह आप?
लूट के कारोबार में जो डालता व्यवधान हो,
ऐसे पर्यावरण-प्रेमी को भी—गोली मार दो!
सच को सच और झूठ को झूठा कहे जो बार-बार,
इस भयानक रोग का होना नहीं है स्वीकार,
सोचने की बीमारी से ग्रस्त यह बीमार है,
राष्ट्र-चिकित्सा का यही उपचार—गोली मार दो!
भूख का, बेकारी का, आँसू का लेखा माँगता,
कर्ज़ में डूबे किसान का भी पता माँगता,
देखिए कितना बड़ा मक्कार निकला आदमी,
आईना दिखला रहा है, इसको—गोली मार दो!
कलम लेकर चल पड़ा है, गीत लेकर चल पड़ा,
भीड़ को इंसान बनने की सीख देकर चल पड़ा,
क्रांति की संभावना का यह खुला अख़बार है,
सावधान! इससे पहले कि पढ़े सब—गोली मार दो!
जब व्यवस्था से बड़ा हो जाए जनता का विवेक,
जब सवालों से निकलने लगे बदलावों का एक रेख,
जब अँधेरों को लगे कि अब सवेरा आ गया,
उससे पहले, हर तरफ़ से—गोली मार दो!
हाँ, यही इतिहास है हर दौर की सत्ता का भी,
पहले बदनाम करो, फिर डराओ, फिर मिटा दो आदमी,
क्योंकि सच की एक चिनगारी बहुत भारी पड़े,
इसलिए हर सच के जन्मते ही—गोली मार दो!
जो किताबों में छिपे इतिहास को पढ़ने लगे,
और परदों के पीछे के भी राज गढ़ने लगे,
नींद में डूबे हुए जनमन को जो जगा रहे,
ऐसे ख़तरनाक लोगों को—गोली मार दो!
जो कहे सत्ता नहीं, जनता बड़ी होती सदा,
सिंहासन की उम्र से लंबी खड़ी होती सदा,
भीड़ को नागरिक बनाने की करे जो आरज़ू,
ऐसे सपनों के मुसाफ़िर को—गोली मार दो!
जो अँधेरों से लड़े और रोशनी की बात करे,
डर के बाज़ारों में भी बेख़ौफ़ सच की बात करे,
क्योंकि सच के सामने झूठों का व्यापार है कमज़ोर,
इससे पहले सच सँभल जाए—गोली मार दो!
मगर याद रखो—
गोली से मरते नहीं प्रश्न,
गोली से मरते नहीं विचार,
गोली से रुकते नहीं इतिहास,
गोली से बुझते नहीं अंगार।
गोली से गिरते हैं तन,
विचार नहीं गिरते,
डर से झुकते हैं सिर,
मगर प्रश्न नहीं झुकते।
एक आवाज़ गिरती है,
तो सौ आवाज़ें उठ खड़ी होती हैं।
एक कलम टूटती है,
तो हज़ार उँगलियाँ लिखने लगती हैं।
और जिस दिन
जनता अपने भय से मुक्त हो जाती है,
उस दिन
गोली हार जाती है,
और इतिहास जीत जाता है।
— रवि कुमार

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naveen dahayat

संपादकीय टीम (Editorial Team)

राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय समसामयिक विषयों पर निष्पक्ष एवं तथ्यात्मक रिपोर्टिंग करने वाले समाचार संवाददाता।

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