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*मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग से बदली नाबालिग की सोच; परिवार से हुआ पुनर्मिलन*

*मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग से बदली नाबालिग की सोच; परिवार से हुआ पुनर्मिलन*
खंडवा
भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में शामिल ओंकारेश्वर की पावन भूमि पर पहुंची एक 17 वर्षीय नाबालिग के जीवन में उस समय नया मोड़ आया, जब बाल संरक्षण तंत्र की संवेदनशील पहल ने उसे भय और असमंजस से निकालकर पुनः परिवार के स्नेहिल वातावरण तक पहुंचा दिया। जावर थाना क्षेत्र की किशोरी पारिवारिक विवाद और विवाह संबंधी दबाव के कारण 2 जून को घर छोड़कर ओंकारेश्वर चली गई थी।
ओंकारेश्वर में वह मंदिर क्षेत्र के आसपास रह रही थी। इसी दौरान गांव के एक परिचित ने उसे पहचान लिया और पुलिस को सूचना दी। इसके बाद विशेष किशोर पुलिस इकाई द्वारा किशोरी को संरक्षण में लेकर न्यायपीठ बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
न्यायपीठ बाल कल्याण समिति खंडवा के अध्यक्ष एवं बाल शिक्षाविद् प्रवीण शर्मा के नेतृत्व में किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 के प्रावधानों के तहत किशोरी को वन स्टॉप सेंटर में सुरक्षित रखा गया। यहां विशेषज्ञों द्वारा उसकी मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग कराई गई। काउंसलिंग के दौरान यह सामने आया कि वह विवाह के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थी और अपनी बात प्रभावी ढंग से परिवार के सामने नहीं रख पाने के कारण घर छोड़कर चली गई थी।
काउंसलिंग में किशोरी को यह समझाया गया कि जीवन की कठिन परिस्थितियों से दूर भागना समाधान नहीं है। संवाद, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच के माध्यम से चुनौतियों का सामना किया जा सकता है। धीरे-धीरे उसके मन में व्याप्त भय और असुरक्षा की भावना कम हुई तथा उसने परिवार के साथ पुनः जुड़ने की इच्छा व्यक्त की।
प्रवीण शर्मा ने कहा कि किशोरावस्था जीवन का अत्यंत संवेदनशील दौर होता है। इस उम्र में बच्चों की भावनाओं, आकांक्षाओं और चिंताओं को समझना परिवार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग आत्मचिंतन, धैर्य और नई शुरुआत का संदेश देता है। यह घटना भी बताती है कि बच्चों को दबाव से नहीं, बल्कि संवाद और विश्वास से सही दिशा दी जा सकती है।
इस पूरे प्रकरण में विशेष किशोर पुलिस इकाई प्रभारी सुनीता जोसफ की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनकी सक्रियता और संवेदनशील हस्तक्षेप से किशोरी को समय पर संरक्षण और आवश्यक सहायता मिल सकी। इस अवसर पर न्यायपीठ बाल कल्याण समिति सदस्य मोहन मालवीय भी उपस्थित रहे।
काउंसलिंग, समझाइश और वैधानिक प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद किशोरी को उसके माता-पिता के सुपुर्द कर दिया गया। यह मामला केवल एक नाबालिग के घर लौटने की कहानी नहीं, बल्कि समाज के लिए एक संदेश भी है कि बच्चों की आवाज सुनना, उनकी भावनाओं का सम्मान करना और समय पर मनोवैज्ञानिक सहयोग उपलब्ध कराना ही सुरक्षित एवं संवेदनशील समाज की पहचान है।

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naveen dahayat

संपादकीय टीम (Editorial Team)

राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय समसामयिक विषयों पर निष्पक्ष एवं तथ्यात्मक रिपोर्टिंग करने वाले समाचार संवाददाता।

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