संघर्षों को हराकर मां बनीं कृष्णा घड़िये, एक साथ तीन अनाथ भाइयों को लिया गोद
मध्यप्रदेश में पहली बार सिंगल मदर ने तीन सिबलिंग बच्चों को अपनाया, उत्तर प्रदेश से खंडवा लाए गए तीनों भाई; सहज समागम फाउंडेशन की पहल से CARA के नियमों के तहत पूरी हुई दत्तक ग्रहण प्रक्रिया
खंडवा। मां बनने के लिए केवल बच्चे को जन्म देना जरूरी नहीं, बल्कि किसी के जीवन को अपनी ममता, स्नेह और सुरक्षा से संवारने का संकल्प भी मातृत्व की सबसे बड़ी पहचान है। इसी भावना को चरितार्थ करते हुए खंडवा की कृष्णा घड़िये ने एक ऐसी मिसाल पेश की है, जो न केवल निमाड़ बल्कि पूरे मध्यप्रदेश के लिए प्रेरणादायक है। कृष्णा घड़िये ने एक साथ तीन अनाथ सगे भाइयों को गोद लेकर अपना परिवार पूरा किया है। मध्यप्रदेश में किसी सिंगल मदर द्वारा एक साथ तीन सिबलिंग बच्चों को गोद लेने का यह पहला मामला बताया जा रहा है। इस विशेष दत्तक ग्रहण प्रक्रिया को खंडवा की सहज समागम फाउंडेशन के विशेष दत्तक ग्रहण अभिकरण (SAA) के माध्यम से पूरा कराया गया।
समाजसेवी सुनील जैन ने बताया की यह कहानी केवल तीन बच्चों को नया परिवार मिलने की नहीं, बल्कि एक ऐसी महिला के संघर्ष, आत्मनिर्भरता, हौसले और मातृत्व की है, जिन्होंने जीवन की तमाम चुनौतियों को पार करते हुए अपनी अलग पहचान बनाई और अब तीन अनाथ बच्चों के जीवन में मां बनकर नई खुशियां लेकर आई हैं।
संघर्षों से लड़कर शिक्षा विभाग में हेडमास्टर तक पहुंचीं कृष्णा
कृष्णा घड़िये का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। पारिवारिक सहयोग के अभाव और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। अपनी मेहनत और लगन से उच्च शिक्षा पूरी की और शिक्षा विभाग में हेडमास्टर के पद तक पहुंचीं। आज वे आर्थिक और सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर हैं। अपना घर, वाहन और जीवन की तमाम सुविधाएं उन्होंने स्वयं की मेहनत और काबिलियत से अर्जित की हैं।
समाजसेवी सुनील जैन ने बताया कि उनकी जिंदगी केवल स्वयं को स्थापित करने तक सीमित नहीं रही। पिछले कई वर्षों से वे लगभग 50 से 60 बच्चों के हॉस्टल में उनके रहने, पालन-पोषण और शिक्षा की जिम्मेदारी भी निभाती आ रही हैं। दूसरों के बच्चों का भविष्य संवारने वाली कृष्णा के मन में लंबे समय से अपना परिवार पूरा करने और मां बनने की इच्छा थी।
उन्होंने पहले अपने भाई के बच्चे को भी अपने बच्चे की तरह पालने-पोसने की जिम्मेदारी निभाई थी। लेकिन उनके मन में एक ऐसे बच्चे को अपना नाम, घर और भविष्य देने की इच्छा थी, जिसे वास्तव में परिवार और मां के स्नेह की जरूरत हो। इसी भावना ने उन्हें अनाथ बच्चों को गोद लेने का निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया।
एक वर्ष के इंतजार के बाद मिला तीन भाइयों को अपनाने का अवसर
सुनील जैन ने बताया कि कृष्णा ने केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) की निर्धारित प्रक्रिया के तहत बच्चों को गोद लेने के लिए पंजीयन कराया। इस दौरान खंडवा स्थित सहज समागम फाउंडेशन एवं किलकारी शिशु गृह की संचालक दीपमाला विधानी से संपर्क कर आवश्यक दस्तावेज और औपचारिकताएं पूरी कीं।
लगभग एक वर्ष के इंतजार के बाद उन्हें तीन सिबलिंग बच्चों को गोद लेने का प्रस्ताव मिला। तीनों बच्चों की अनुमानित उम्र लगभग 5, 7 और 12 वर्ष बताई गई। बच्चों के बारे में जानकारी मिलने और उनसे मिलने के बाद कृष्णा ने तीनों को एक साथ अपनाने का निर्णय लिया। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि तीनों सगे भाइयों का आपसी रिश्ता बना रहे और उन्हें अलग-अलग परिवारों में न जाना पड़े।
माता-पिता को खोने के बाद उत्तर प्रदेश की संस्था में मिला था सहारा
तीनों बच्चों की कहानी भी बेहद भावुक कर देने वाली है। जानकारी के अनुसार, बच्चों की मां का निधन हो चुका था। इसके बाद उनके पिता, जो होटल में काम करते थे, बच्चों का पालन-पोषण कर रहे थे। बाद में पिता का भी निधन हो गया, जिसके चलते तीनों बच्चे अनाथ हो गए। ऐसी परिस्थिति में उत्तर प्रदेश की एक संस्था ने तीनों बच्चों को अपने संरक्षण में लेकर उनके रहने, पालन-पोषण और देखभाल की जिम्मेदारी संभाली।
करीब दो-तीन वर्षों से तीनों भाई संस्था में रह रहे थे। CARA के पोर्टल पर उपलब्ध दत्तक ग्रहण प्रक्रिया के माध्यम से इन तीनों सगे भाइयों को एक ही परिवार में स्थान दिलाने का अवसर सामने आया।
खुद कार चलाकर उत्तर प्रदेश पहुंचीं, तीनों बच्चों को लेकर लौटीं खंडवा
कृष्णा का बच्चों के प्रति अपनापन और उन्हें परिवार में लाने का उत्साह देखते ही बनता था। तीनों बच्चों को अपने परिवार में लाने के लिए वे स्वयं कार चलाकर उत्तर प्रदेश पहुंचीं। वहां संबंधित संस्था से आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद तीनों बच्चों को अपने साथ लेकर खंडवा लौटीं।
सुनील जैन ने बताया कि इस पूरी प्रक्रिया में अनाथ अज्ञात बच्चों का पालन पोषण करने वाली सहज समागम फाउंडेशन की संचालक दीपमाला विधानी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। संस्था के मार्गदर्शन और सहयोग से CARA के निर्धारित नियमों एवं कानूनी प्रक्रिया के अनुसार दत्तक ग्रहण की सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कराई गईं। इसके बाद तीनों सिबलिंग बच्चों का दत्तक ग्रहण संपन्न हुआ और अब तीनों भाइयों को एक ऐसा परिवार मिल गया है, जहां वे एक साथ रहकर अपना नया जीवन शुरू कर सकेंगे।
मध्यप्रदेश में पहला सिबलिंग सिंगल मदर एडॉप्शन, सहज समागम फाउंडेशन की महत्वपूर्ण भूमिका
इस पूरे मामले की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि मध्यप्रदेश में पहली बार किसी सिंगल मदर द्वारा एक साथ तीन सगे भाइयों को गोद लेने की दत्तक ग्रहण प्रक्रिया पूरी हुई है। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को खंडवा की सहज समागम फाउंडेशन के माध्यम से संपन्न कराया गया।
सहज समागम फाउंडेशन निमाड़ क्षेत्र की पंजीकृत विशेष दत्तक ग्रहण अभिकरण (Specialised Adoption Agency-SAA) है। संस्था की संचालक दीपमाला विधानी के मार्गदर्शन में उत्तर प्रदेश की संस्था में संरक्षण प्राप्त तीनों बच्चों को खंडवा लाकर उन्हें एक ही परिवार में स्थान दिलाने की प्रक्रिया पूरी कराई गई।
यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सिबलिंग बच्चों को एक साथ परिवार मिलने से उनके आपसी भावनात्मक रिश्ते सुरक्षित रहते हैं। संस्था का उद्देश्य केवल बच्चों को दत्तक परिवार तक पहुंचाना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित, स्थायी और प्रेमपूर्ण पारिवारिक वातावरण उपलब्ध कराना भी है।
संघर्षों से सफलता तक और अब तीन बच्चों के जीवन में खुशियों की नई शुरुआत
कृष्णा घड़िये की यह कहानी उन महिलाओं के लिए भी प्रेरणा है, जो जीवन में अकेले संघर्ष करते हुए अपनी पहचान बनाती हैं। उन्होंने अपनी मेहनत से शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में मुकाम हासिल किया, कई बच्चों की जिम्मेदारी निभाई और अब तीन अनाथ भाइयों को मां का प्यार देकर उनके जीवन को नई दिशा दी है।
आज कृष्णा घड़िये का परिवार तीन बच्चों के आने से पूरा हुआ है। जिन तीन भाइयों ने जीवन में माता-पिता दोनों को खो दिया था, उन्हें अब मां का आंचल, घर का अपनापन और सुरक्षित भविष्य मिलने की उम्मीद जगी है।
यह केवल एक दत्तक ग्रहण नहीं, बल्कि एक महिला के साहस और तीन बच्चों के जीवन में लौटती खुशियों की कहानी है। कृष्णा घड़िये ने साबित किया है कि मां बनने के लिए किसी रिश्ते की मोहर नहीं, बल्कि दिल में ममता, जिम्मेदारी उठाने का साहस और बच्चों को अपनाने का सच्चा जज्बा होना जरूरी है।
